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बिना झूले का बचपन

Posted On: 28 Mar, 2012 Others में

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शहर का इतिहास भले ही पुराना हो. जहां हर किसी के लिए कुछ न कुछ जरूर है, लेकिन बच्चों को अभी तक अपने इस शहर में एक अदद पार्क का इंतजार है. बच्चे अपना बचपन बिना पार्क के गुजार रहे हैं. जिनको कंप्यूटर और वीडियो गेम्स से ज्यादा झूले झूलना पसंद है. जो खुली हवा में ठंडी और मुलायम घास में उछलना और कूदना चाहते है. जिसके लिए उनका बचपन मचल रहा है, मगर अफसोस उस पल को जीने का मौका उनसे छीना जा रहा है. ऐसा ही एक बच्चा मुझे मिला जो इस बात से परेशान है कि वो कहां खेले. उसकी ये शिकायत उन तमाम लोगों से थी, जो इस बात को जानते हुए भी कुछ नहीं कर रहे हैं. चलो उसके द्वारा कही हुई बातें आपसे भी शेयर करता हूं. हो सकता है, आप ही उस बच्चे की परेशानी का हल निकाल दें.
मुझे पार्क चाहिए
मुझे पार्क चाहिए (बिना अपना परिचय दिए बच्चे ने बड़ी ही मासूमियत से सबसे पहले यही तीन शब्द कहे). मैं शहर का आम किस्म का बच्चा हूं. मैंने अपने बड़ों को कहते सुना है बच्चों को हमेशा पार्क में ही खेलना चाहिए. वही एक जगह है जो बच्चों के लिए सुरक्षित है, मगर इस शहर में मेरे लिए एक भी पार्क नहीं है. मैं बैठा हुआ यही सोचता रहता हूं. जहां इस प्रदेश में महापुरुषों के लिए इतने सारे पार्क बनवाए गए हैं, वहां बच्चों के लिए एक भी पार्क नहीं है. कोई क्यों ये नहीं सोचता कि हम जैसे छोटे बच्चों को पार्क की कितनी जरूरत है. (बच्चे की इस जिद ने मुझे अपने बचपन की याद दिला दी, शायद आपको भी याद दिला दे).
झूले झूलना पसंद है
मैंने आज तक झूला नहीं झूला. मैं भी उसका अहसास लेना चाहता हूं. हमेशा टीवी पर देखता हूं, बच्चों को पार्क में झूला झूलते हुए. अपने मम्मी-पापा के साथ तरह-तरह की राइड्स का मजा लेते हुए. कितना एक्साइटिंग होता होगा उनके लिए, जो सच में ऐसा करते होंगे. कुछ ऐसी ही एक्साइटमेंट मुझे भी होती है. काश मैं भी हाथी और जिराफ डिजाइन में बने झूलों में स्लाइड कर सकता. महज पांच मिनट रोलर में झूलकर मस्त हो पूरे पार्क में झूम सकता. मगर इस शहर में ये सब नहीं है.
बोर हो चुका हूं
मैं काफी बोर हो चुका हूं. (अपनी लाइफ में पहली बार किसी बच्चे के मुंह से सुना कि वो बोर हो चूका है). मेरे पास तमाम वीडियो गेम्स और कंप्यूटर गेम्स के साथ गजेट्स और ऐनिमेटिड फिल्मों की कई सारी सीडीज पड़ी हुई हैं. जिनसे मेरी नफरत बढ़ती जा रही है. पापा से कई बार कह चुका हूं, मुझे ये सब बिल्कुल नहीं चाहिए. अब तो दोस्तों ने भी मेरे घर आना बंद कर दिया है. क्योंकि मैंने नए गेम्स लाना जो बंद कर दिया है. अगर मेरे घर के पास पार्क होता तो उनके साथ क्रिकेट खेल सकता, बैडमिंटन खेलकर आनंद कर सकता. पूरे पार्क पर सिर्फ अपना ही राज होता.
परेशान भी हूं
अब जब मैं अपने हाईटेक गेम्स से बोर हो चुका हूं, तो अपनी लाइफ को इंज्वायफुल बनाने के लिए मैंने अपने घर के बाहर खेलना शुरू कर दिया. कल ही की बात है, मेरे दोस्त से पड़ोस वाले घर का शीशा टूट गया. बहुत डांट पड़ी. मुझे कहा गया कि अब से घर के बाहर क्रिकेट नहीं खेलना है. इतने सारे गेम्स हैं उनसे खेलों. ये बातें सुनकर तो मैं अब और भी परेशान हो गया हूं. क्या मेरी इस फरियाद को सुनने वाला कोई नहीं है.



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

JJ Blog के द्वारा
March 31, 2012

आदरणीय सौरभ शर्मा जी, आपका ब्लॉग “बिना झूले का बचपन” नाम से दिनॉक 31 मार्च 2012 को दैनिक जागरण के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ है. इस हेतु आपके पास सूचना आपकी मेल आई डी पर भेजी जा चुकी है. मंच की तरफ से आपको हार्दिक बधाइयां धन्यवाद जागरण जंक्शन परिवार

omdikshit के द्वारा
March 30, 2012

सौरभ जी , बहुत अच्छ विषय.आज कल केवल राजनीतिक-पार्क ही बनता है यहाँ.जहाँ चिल्ड्रेन-पार्क बना भी है,वहां इतना फीस व्यापारियों ने लगा रखा है की सामान्य बच्चे जा ही नहीं सकते.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 29, 2012

बिलकुल नए सन्दर्भ को छेड़ा है | बधाई !

Jamuna के द्वारा
March 29, 2012

तकनीक ने विलासिता का जीवन दिया है. और विलासिता ने बीमारी को जन्म दिया है…. सुन्दर रचना http://jamuna.jagranjunction.com/


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